Sanskriti Mandal & Ideal School

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विद्यालयों में संस्कृति मण्डल का गठन


सांस्कृतिक अभियान के बढ़ते कदम

सबके लिए सद्बुद्धि
सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थनाएँ
गायत्री मंत्र- सार्वभौम प्रार्थना
भूर्भव:स्व:तत्सवितुर्वरेण्यं भार्गे देवस्य धीमहि धियों यो न: प्रचोदयात्।
भावार्थ- उस प्राण स्वरूप, दुखनाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूव परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
जैन- नमो अरिहंताणं। नमो सिद्धाणं। नमो आयरियाणं।
नमो उवज्झायाणं। नमो लोए सव्व- साहूणं।
एसो पंच- नुमक्कारो सव्व- पावप्पणसणो।
मंगलाणं च सव्वेङ्क्षस पढमं हवइ मंगल॥
सिक्ख- एक सतनाम कर्तापुरुष निर्भाव निवैंर अकालमूरत आजुनी साहिबान गुरुप्रसाद जप। आदि सच, जुगादि सच, है भी सच नानक होसी भी सच।
मुस्लिम- बिस्मिल्लाहिर्रहमाननिर्रहीम् अल्- हम्दु लिल्लाह- ए रब्बिल आलमीन।
अरँहमानिर्रहीम्। मालिकेयौमिद्दीन। ईय्याकन- अबोदो वइय्याक नस्तईन।
एहदिनस्सेरातल् मुस्तकीम।-सिरातल्ल जीन अनअमत् अलै हिम गैरिल् मग्जुबे अलैहिम् व लज्जाल्लीन।
आमीन क्रिश्चियन

यहाँ परमात्मा चेतना सत्ता  के रूप में हैं। उसका अल्लाह, गॉड, वाहे गुरु, तीर्थंकर, बुद्ध आदि अपने इष्टनुसार ध्यान किया जा सकता है।दो शब्द
भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से शांतिकुंज, हरिद्वार द्वारा विद्यार्थियों में एक संस्कृति चेतना जाग्रत् करने का प्रयास राष्टरीय स्तर पर किया जा रहा है। परीक्षा के लिए रचित साहित्य से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों के बारे में जानकारी ही नहीं प्राप्त होती, अपितु नैतिक जीवन की ओर अग्रसर होने की भी प्रेरणा मिलती है। विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण और उनके नैतिक विकास के लिए यह उपयुक्त समझा गया है कि विद्यालयों में विद्यार्थियों से कुछ ऐसी पाठ्य सहगामी क्रियाएँ कराई जाएँ, जिनमें उन्हें अपनी प्रतिभा और चारित्रक विकास के अवसर उपलब्ध होते रहें। इस प्रयोजन हेतु विद्यालयों में ‘‘संस्कति मंडल’’ गठित करने की योजना बनाई गई है। इसके माध्यम से विद्यार्थी अपने विद्यालय के शिक्षक एवं स्थानीय प्राणवान् गायत्री परिजनों के सहयोग से विभिन्न कार्यक्रमों में भाग ले सकेंगे। इससे उन्हें अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार को परिमार्जित करने का अवसर उपलब्ध हो सकेगा तथा वे अपने आपको कर्तव्यनिष्ठ, सभ्य और श्रेष्ठ नारिक के रूप में विकसित कर सकेंगे।

संस्कृति मण्डल का गठन
संस्कृति मण्डल- विद्यालय के छात्र- छात्राओं का एक संगठन होगा आवश्यकतानुसार इसका पुनर्गठन होता रहेगा।
नाम- साधारणतया ‘संस्कृति मण्डल’ के आगे विद्यालय का नाम जोड़ा जायेगा।
विशेषण के रूप में संस्कृति मण्डल के पूर्व महापुरुष या लोकदेवता का नाम भी जोड़ा जा सकता है। यथा ‘‘विवेकानन्द संस्कृति मण्डल रा.उ.मा.विद्यालय ....................।’’
कार्यक्षेत्र- संस्कृति मण्डल का कार्यक्षेत्र मुख्यतया अपना विद्यालय ही होगा, किन्तु सेवा एवं सांस्कृतिक चेतना जागरण के कार्य युग निर्माण स्काउट एवं गाइड के सहयोग से विद्यालय के बाहर भी गाँव, चौपाल, सार्वजनिक स्थान पर कर सकेंगे।
संरक्षक- विद्यालय के प्रधानाध्यपक/ प्रधानाचर्या संस्कृति मण्डल के संरक्षक होंगे।
सदस्य- भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले सभी छात्र इसके सदस्य होंगे इसमें कोई संख्या निर्धारित नहीं है।
सहयोगी सदस्य- 1. विद्यालय के वे शिक्षक जिन्होंने भा.सं.ज्ञा.प.में रुचि ली तथा जिन्हें भारतीय संस्कृति में रुचि है। इन्हें प्रधानाध्यपक/ प्रधानाचार्य नामित करेंगे। 2. गायत्री परिजन जो भा.सं.ज्ञा.प. आयोजित कराते रहे हैं वे भी सहयोगी सदस्य होंगे।
परामर्शदाता- 1. अभिभावक, जिन्हें भारतीय संस्कृति में रुचि है, मण्डल के परामर्श दाता हो सकेंगे। 2 स्थानीय स्तर के बुद्धिजीवी, समाजसेवी मण्डल के परामर्शदाता हो सकेंगे।
नायक एवं प्रभारी- 1. संस्कृति मण्डल के सदस्य छात्र मिल- जुल कर मण्डल नायक का चयन करेंगे। 2. मण्डल नायक- आपस में परामर्श कर छात्रों में से क्रिया- कलाप के अनुसार प्रभारी नामित कर सकेंग।
नैतिक पंजीयन- गायत्री परिजन संस्था प्रधान के सहयोग से संस्कृति मण्डल का गठन करेंगे। इसका नैतिक पंजीयन स्थानीय गायत्री परिवार संगठन के सहयोग से किया जायेगा, ताकि गतिविधियों में प्रेरणा- सहयोग मिलता रहे।
संस्कृति मण्डल का कोष- साधरणतया इसके क्रियाकलाप खर्च साध्य नहीं हैं, फिर भी आवश्यक व्यय आवश्यक व्यय आपसी सहयोग या स्थानीय परिवार संगभ्र से मिलकर किया जायेगा।
मुख्य उद्देश्य- छात्रों का सर्वांगीण विकास
संस्कृति मण्डल के निम्रांकित उद्देश्य निर्धारित किए गये हैं-
उनके नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित करना।
उनमें स्वास्थ्य- संवद्र्धन, पर्यावरण सुधार तथा स्वावलम्बन में रुचि जाग्रत् करना।
उनमें रूढिय़ों, कुरीतियों के निवारण एवं व्यसन मुक्ति संकल्पों को जाग्रत करना।
छात्रों की सृजनात्मक शक्तियों को विकसित करना।
छात्रों में राष्ट्रीय भावना जाग्रत् करना।
क्रियान्वयन के क्रमबद्ध चरण
1. विद्यालय में किए जाने वाले कार्य
(अ) नियमित कार्य-
* प्रार्थना सभा में जोड़े जाने वाले कार्य- सर्व धर्म प्रार्थना, गायत्री मंत्र का सस्वर पाठ, सत्संकल्प -पाठ, ध्यान- साधना, प्रेरक प्रसंग सुनाना।
* हर माह/ में उस अवधि में आने वाले छात्रों के जन्म दिवस संस्कार, बाल सभा के माह/ में एक बार विद्यालय सफाई अभियान आयोजित करना।
(ब) सामयिक कार्य-
* सत्रारंभ पर ज्ञान दीक्षा/ विद्यारंभ संस्कार मनाना।
* भा.सं.ज्ञा.परीक्षा में अधिकाधिक छात्रों को प्रवेश दिलाना।
* विद्यालय की चहारदिवारी में वृक्षारोपण करना। (जुलाई- अगस्त के कार्य हैं।)
* भा.सं.ज्ञा.परीक्षा के प्रवीण छात्र तथा प्रतिभावना छोत्रों का सम्मान- समारोह मनाना। (परीक्षा एवं सत्रावसान पूर्व मनाना।)
* पर्व एवं जयन्तियाँ, निर्धारित तिथियों के अनुसार मनाने में सहयोग करना।
(स) सुविधानुसार समय में किए जाने वालेा कार्य --
* विद्यालय में एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करना। विभिन्न कैम्पों के साथ भी एक दिन जोड़ा जा सकता है। * स्वास्थ्य जाँच एवं योग शिविर। * स्वावलम्बन गोष्ठ/शिविर। * व्यसन मुक्ति गोष्ठ/शिविर। * भाषण, वाद- विवाद, निबंध लेखन, सामान्य ज्ञान, स्मृति विकास प्रतियोगिता, आयोजित करना। * विद्यालय में सद्वाक्य लेखन, पोस्टर, ध्यान एवं योग के चार्ट, उचित स्थान पर लगाना।
भावभरा अनुरोध

शिक्षकों से
राष्टर निर्माण में प्रमुख भूमिका शिक्षकों की है। छात्रों में अध्ययनकाल में ही शारीरिक क्षमता- ऊर्जा दुष्प्रवृत्तियों के बदले सृजनात्मक कार्यों में लगे, ऐसी समझदारी पैदा की जाये। शक्ति के सदुपयोग के लिए शालीनता आवश्यक है, अत: उन्हें ऐसे उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपे जाएँ, जिसमें शालीनता प्रदॢशत हो। पढ़ते- पढ़ते उनमें स्वावलम्बन के प्रति रुचि बढ़े, ऐसे अभ्यास कराये जायें। सेवा मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। आदर्श युवक राष्टर की थाती हैं। उनके लिए चार उद्घोष किये गये हैं, जिनकी कार्य योजना परिशिष्ट में दी गई है।
1. स्वस्थ युवक -- सबल राष्ट। 2. शालीन युवक -- श्रेष्ठ राष्टर
3. स्वावलम्बी युवक -- सम्पन्न राष्टर 4. सेवाभावी युवक -- सुखी राष्टर
शिक्षकों के कन्धों पर राष्टर की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। वे जैसे छात्र तैयार करेंगे, वैसा राष्टर बनेगा, यथा- ‘‘अध्यापक हैं युग निर्माता- छात्र राष्टर के भाग्यविधाता’’।
गायत्री परिजनों से --
* विद्यालयों में संस्थाप्रधान, शिक्षकों एवं छात्रों से सम्पर्क कर ‘संस्कृति मण्डल’ का गठन करें।
* संस्कृति मण्डल की गतिविधियों में मागदर्शन एवं सहयोग प्रदान करें।
* विद्यालय में अभीष्ट वातावरण निर्माण में चार्ट- पोस्टर तथा संस्कृति मण्डल को आवश्यक पुस्तके, सामाग्री देने में प्रज्ञामण्ल/ शक्तिपीठ/ दानदाताओं से सहयोग प्राप्त करें।
* परिजन संस्कृति मण्डल गोद लेकर सतत सम्पर्क करते रहें। उपेन प्रयासों एवं मण्डल द्वारा चलाई जा रही गतिविधियों की जानकरी जिला/ जोन कार्यालक/ शातिकुंज देते रहें।
* संस्कृति मण्डलों का नैतिक पंजीयन गायत्री परिवार ट्रस्ट अथवा शांतिकुंज से करें तथा समय- समया पर सहयोग, मार्गदर्शन व पत्र व्यवहार करते रहें तथा उसकी संपूर्ण जानकारी शांतिकुंज- भा.सं.ज्ञा.परीक्षा प्रकोष्ठ में अवश्य भेजें।
विद्यर्थियों से :-
विद्यार्थी जीवन के क्रियाकलाप ही सम्पूर्ण जिन्दगी के आधार बनते हैं। आप अपनी पढ़ाई के साथ बहुमुखी प्रतिभा के विकास के लिए ‘‘संस्कृति मण्डल’’ के क्रियाकलापों में गहरी रुचि लें। संस्कृति मण्डल का गठन करें।
* अधिक से अधिक छात्रों को इसकेक सदस्य बनावें।
* गुरुजन, अभिभावकों गायत्री परिजनों, बुद्धिजीवी, समाज सेवियों से सम्पर्क, मार्गदर्शन लेकर अधिकाधिक क्रियाकलाप संस्कृति मण्डल के माध्यम से करने का अवसर खोजें।
* परीक्षा के समय को छोडक़र शेष अवधि में ऐसे क्रियाकलापों की योजना बनावें जो विद्यालय में किए जा सकते हैं।
* हर माह अपने साथी छात्रों के सामूहिक जन्मदिवस शाला में अवश्य मनावें जिसमें एक बुराई छोड़े तथा एक अच्छाई ग्रहण करें।
* जो क्रिया कलाप विद्यालय समय में नहीं हो पाते हैं, वे अवकाश के समय में भी किए जा सकते हैं। प्रज्ञापीठ/ शक्तिपीठ या ग्राम की चौपाल पर भी कई गतिविधियाँ चलाई जा सकती हैं।
* आपके मण्डल का नैमिक पंजीयन निकटतम् गायत्री परिवार ट्रस्ट अथवा शांतिकुंज से करावें, ताकि आवश्यक प्रेरणा, मार्गदर्शन व सहयोग वहीं से मिलता रहेगा।
संस्कृति मण्डल गठन पत्रक (प्रारूप पत्र)
1. संस्कृति मण्डल का नाम...........................विद्यालय का नाम एवं पता..............................2. संरक्षक (संस्थाप्रधान) का नाम.........................3. सदस्य- (भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा बैठने वाले विद्यार्थी जो स्वेच्छा से आगे आएँ)

1.नाम...................................कक्षा..............................
2. नाम........................................कक्षा.......................
नोट- अधिक छात्र होने पर सूची संलग्न करें।
4. शिक्षक सदस्य (भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में सहयोगी शिक्षक)
1. नाम.................................फोन नं.................. 2. नाम .....................फोन नं................
5. गायत्री परिवार से जुड़े कार्यकत्र्ता सदस्य --
1.नाम..................................फोन नं. ...........................
2.नाम..................................फोन नं............................
6. परामर्श दाता- (1. संस्कृति एवं शिक्षा में रुचि रखने वाले गाँव/ क्षेत्र के प्रबुद्ध समाजेवी, गणमान्य नागरिक में)
1. नाम.............................पद/ पता..............................फोन नं..............................7. संस्कृति मण्डल के नायक का नाम (विद्यार्थी अपनों में से एक को नायक चुनेंगे)
श्री..................................आत्म श्री.............................
कक्षा..................पूर्ण पता............................................फोन नं............................संस्कृति मण्डल का गठन आज दिनाँक .................................. को दिया गया। इसके उद्देश्यों को समझ कर सबने भावी क्रिया कलापों को निष्ठापूर्वक चलाने का संकल्प लिया।


हस्ताक्षर हस्ताक्षर हस्ताक्षर

संस्कृति मण्डल सं.मण्डल नायक प्रधानाचार्य/ प्रधानाध्यापक
गठन सहयोगी शाला संस्कृति मण्डल.............................................................परिजन
1. पंजीयन- शान्तिकुंज (भा.सं.ज्ञा.प.प्रकोष्ठ) में होगा।
2. नोट :- यह पत्रक भरकर एक प्रति संस्कृति मण्डल में तथा एक प्रति गायत्री शक्तिपीठ/ प्रज्ञापीठ/ प्रज्ञापीठ/ शांतिकुंज पर भिजावें ताकि पंजीयन एवं आवश्यक
पंजीकृत इसके एक प्रति सहयोगी- मार्गदर्शन दिया जा सके।
अध्यापक है युग निर्माता।
छात्र राष्टर के भाग्य विधाता॥
समाज के मूर्धन्य समझे जाने वाले वर्गों में अध्यापक वर्ग अपेक्षाकृत अधिक जागरुक, चिन्तक, तथा जिम्मेदार होता है। इसीलिये अध्यापक को देश के भावों नागरिकों का निर्माता कहा गया है। वह अपने छात्रों को जिस प्रकार का बनायेगा, उसी पर राष्टर का भाग्य व भविष्य निर्भर होगा। अत:अध्यापक केवल छात्र का नहीं, राष्टर का निर्माता है।
प्राचीन गुरुकुल पद्धति में शिक्षक या गुरु के पद पर आसीन व्यक्ति को ज्ञानी होने के साथ- साथ तपस्वी तथा चरित्रवान होना भी आवश्यक था। क्योंकि छत्रों पर शिक्षक के चिन्तन व आवश्क व्यक्ति को ज्ञानी होने के साथ- साथ पतस्वी तथा चरित्रवान होना भी आवश्यक था। क्योंकि छात्रों पर शिक्षक के चिन्तन व आचरण का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता हैं।
विद्यालयों में दिवसीय प्रशिक्षण शिविर

* भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में बैठे विद्यार्थी, संस्कृति मण्डल के सदस्य, संस्कृति में रुचि रखने वाले एवं स्वेच्छा से भाग लेने वाले चयनित विद्यार्थी भागीदार होंगे।
* शिविर आयोजन अवकाश के दिन या कार्य दिवस जो संस्थाप्रधान निर्धारत करें।
* समय प्रात: 8 बजे से सायं 4 बजे तक (स्थानीय परिस्थिति के अनुसार कम- अधिक किया जा सकता है।)
* विद्यार्थी अपने साथ दोपहर का भोजन घर से लायेंगे। जलपान व्यवस्था आयोजकों द्वारा भी की जा सकती है।
7.00 से 8.00 प्रात: पंजीयन
8.00 से 9.00 प्रात: उद्घाटन सत्र- आसन ग्रहण, स्वागत, दीप- प्रज्वलन,
प्रार्थना- ‘वह शक्ति हमें दो..................।’
8.30 से 9.30 प्रात: युग निर्माण योजना (एक परिचय)
9.30 से 10.30 प्रात: मानव जीवन की गरिमा
10.30 प्रात: भोजन
12.30 अपराह्न जीवन जीने की कला (उपसाना, साधना, सेवा, स्वावलम्बी जीवन)
1.00 से 2.00 अराह्न समग्र स्वास्थ्य, व्यसन मुक्ति
2.10 से 3.00 दोपहर संस्कृति मण्डल क्रिया कलाप, जन्मदिवस संस्कार
3.15 बज दोपहर स्वावलम्बन एवं श्रमदान
4.30 बजे दोपहर समापन विदाई
* स्थानीय परिस्थिति के अनुसार समय एवं विषय वस्तु को कम- अधिक भी किया जा सकता है।
विद्याॢथयों के लिए उपयोगी पुस्तकें एवं उनके संस्मरण
1. नीच एवं दलितों को अपनाने वाले- गुरुनानक..............................पैर उधर कर दे जहाँ काबा नहीं। .................उजड़ जाओं! आबाद रहो! ..................आठ कन्नोजिया नौ चूल्हे की रूढि समाप्त। मेरी जाति वही हे, जो अग्नि एवं वायु की है।..........................राम दी चिडिय़ा राम दी खेत।
2. सन्त विनोबा भावे- ..............दान नहीं गरीबी का हक।..............गाँव की लक्ष्मी पांच रास्तों से भागती है।.............. लाख मील पैदल यात्रा।............ लाख एकड़ जमीन गरीबों को दान .............हजार ग्राम दान मे मिले।................विवेकानन्द की आत्मा ने झझोरा।..............सबै भूमि गोपाल की, नही किसी की मालिकी।
3. भक्ति और शार्य के अमर साधक- गुरुगोविन्द सिंह- .............पूज्य पिताजी आप से बड़ा महापुरुष और कौन है।............डाकुओं का हृदय परिवर्तन।.............जन समूह की अद्भूत परीक्षा।.............जुझार सिंह की आंखों में आंसू।...........बन्दा बैरागी का अद्भूत बलिदान।
4. वर्तमान जगत के युग पुरुष- महात्मा गांधी- .......... कुली बैरिस्टर........सामान प्लेटफार्म पर फेंक दिया..........दांडी यात्रा...........राउण्ड टेबल कॉन्फेंस...............कालजयी महात्मा गाँधी।.............. अब मेरी कौन सुनगा।...............दार्शनिक रोम्यारोला ने हाहा...........।
5. भक्ति और शक्ति के समन्वयी- समर्थ रामदास- ............मुझे शरेनी का दूध चाहिये .................सौभाग्यवती- पुत्रवती हो।............... ‘सावधान’ उद्घोष ने जीवन लक्ष्य का बोध कराया। ..........काशीविश्वनाथ की मूॢत लेुप्त हुई।
6. ङ्क्षहदूर जाति के उद्धारकर्ता- स्वामी दयानन्द सरस्वती- ...........महाराज जान जायेंगे तो बिना फाँसी पर चढ़ाये न मानेंगे........... पाखण्ड खण्डिनी पताका गाड़ दी........दुर्जनता को सज्जनता से जीता............क्या चमड़े से आपके बाल मूड़े गये हैं?
7. स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी पं.श्रीराम शर्मा आचार्य- .............मत्त जी रात भर कीचड़ में बेहोश पड़े रहे।...........शौच के बहाने तौलिया लपेटकर सत्याग्रह में शामिल। ............मत्त प्रलाप नाम से कई क्रान्तिकारी गीत। .........आगरा एवं आसनसोल जेल की घटनाएँ............... राजनैतिक आजादी के बाद सांस्कृति आजादी के बाद सांस्कृतिक आजादी के लिए जीवन लगाया।
8. अहिंसा और अपरिग्रह के प्रतीक- महावीर स्वामी- ..........बड़े भाई नन्दिवर्धन ने आकर कहा...........बारह भावना.............। अहिंसा परमोधर्म............अपरिग्रह की महिमा .............जीवन निर्माणकारी व्रत............ब्राह्मणधर्म पर चिरस्मरणीय मुहर।
9. आदर्श वीरांगना- महारानी लक्ष्मीबाई- .........खूब लड़ी मर्दानी वह तो ........घर के शत्रुओं से युद्ध,...............झाँसी की लूट...............कालपी पर चढ़ाई........रहिमन साँचे सूर को करे बखान।
इसी क्रम में-
10. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर 11. स्वामी रामतीर्थ
12. पंजाब केसरी लाला लाजपतराय 13. स्वतंत्रता के उपासक- महाराणा प्रताप
14. सुभाषचंद्र बोस 15. चन्द्रशेखर आजाद
16.क्रान्तिवीर भगतसिंह 17. लोकमान्य तिलक, टैगोर
18. स्वामी केशवानन्द 19. सरदार वल्लभभाई पटेल
20. वीरशिवाजी 21. रानी दुर्गावती
22. भगिनी निवेदिता 23. महात्मा बुद्ध
24. महापुरुष ईसा 25. संत कबीर
26. गणेशशकंकर विद्यार्थी 27. कार्लमाक्र्स आदि मूल्य 3/-

व्यक्तित्व को निखारने वाली महत्त्वपूर्ण पुस्तकें

1. आराम नहीं काम कीजिये 2. आलस्य छोडिये, परिश्रमी बनिये
3. निराशा को पास न फटकने दें 4. आगे बढऩे की तैयारी
5. प्रखर प्रतिभा की जाननी- इच्छा शक्ति 6. बड़े आदमी नहीं, महामानव बनें
7. सफलता के सात सूत्र 8. समय का सदुपयोग
9. वेश- भूषा शालीन रखें 10. श्रम है सुख का सेतु
11. मित्र भाव बढ़ाने की कला 12. युवा क्रांति पथ
13. वर्तमान चुनौतियाँ और युवा वर्ग 14. वशीकरण की सच्ची सिद्धि
15. अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।
विद्यार्थियों से संदर्भित अन्य पुस्तकों की सूची निम्रानुसार है

1. जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र- 3/- जीवन की भूल भुलैया, स्वर्ग और नरक कहाँ ? पंचशील ............ चार सूत्र............सूनिश्चित राजमार्ग।
2. बड़े आदमी नहीं, महामानव बनें- 15/- कथित बड़े आदमी एवं महामानवों की तुलना। कैसे महामानव बनें?
3. समग्र स्वास्थ्य संवर्धन कैसे- 5/- शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य कैसे ठीक करें?
4. सात्विक दिनचर्या एवं दीर्घायुष्य- 5/- व्यवस्थित दिनचर्या से आयु बढ़ती है। व्यवस्थित दिनचर्या कैसे अभ्यास में लाएँ?
5. मनोविकार सर्वनाशी शत्रु- 5/- निराशा का अभिशाप। मनोरोगों के उपचार। वास्तविक बल आत्मविश्वास। आत्महीनता की ग्रन्थि, कैसे बचे?
6. स्वास्थ्य रक्षा प्रकृति के अनुसरण से- 5/- प्रकृति के साथ रहने वाले बीमार नहीं होते। कैसे प्राकृतिक जीवन जिया जाय?
7. विकृत चिंतन, रोग- शोक का मूलभूत कारण- 4/- आकांक्षा विकृत होने से बचाएँ। शैली बदलना..........मनोबल बढ़ाये रखें। किन बातों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए? सहजता कैसे बनी रहें?
8. शक्ति- संचय के पथ पर- 4/- शक्ति सम्पन्न होने की विधाएँ।
9. क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें? शीर्षक से स्पष्ट है।
10. ब्रह्मचर्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता- 2/- ब्रह्मचर्य का स्वरूप, महत्त्व एवं दृष्टत।
11. प्रज्ञा अभियान- योगा व्यायाम- 3/- एक समग्र योग व्यायाम ......... हानि रहित हर उम्र का व्यक्ति कर सकता है।
12. आसन- प्राणायाम- 4/- कुछ सरल आसन................हानि रहित प्राणायाम।
13. निरोग जीवन- 3./- रोग से डरें नहीं.............. दीर्घ जीवन के रहस्य...........चिकितसा के नाम पर ठगायें नहीं..............स्वस्थ रहने की दिनचर्या।
14. योगचिकित्सा संदर्शिका- 10/ सभी प्रकार के रोगों की चिकित्सा योग द्वारा
15. तम्बांकू एक भयंकर दुव्र्यसन- 4/- नपुंसक बनना हो तो तम्बाकू सेवन करें। आॢथक, सामाजिक, वैज्ञानिक विश्लेषण। जितना समय धूम्रपान में लगता है, उससे तीन गुनी आयु घटती है।
16. प्राणघातक व्यसन- 3/- सभी तहर के व्यसनों की हानियों का वैज्ञानिक विश्लेषण।
17. दहेज एक कुरीति- 4/- निरीह बच्चियों का नृशंस वध। कुछ विचारणीय घटनाएँ। लडक़े कुँवारे रहेंगे। इस सभ्य डकैती को कब तक बर्दाश्त करेंगे? इस कलंक को कैसे धोयें?
18. कुरीतियों का चक्र तोडऩा ही होगा- 4/- चित्र।- विचत्र तरह की कुरीतियों का विस्तृत वर्णन कैसे इस कुचक्र से बचें?
19. उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता- 4/- उपासना का अर्थ। ईश्वर क्या है? हम किसकी उपासना करें? उपासना का वैज्ञानिक स्वरूप। एकांगी उपासना नहीं।
20. जीवन देवता की साधना आराधना- 4/- मानव जीवन को कल्पवृक्ष बनाने की साधना एवं सूत्र।
21. उज्ज्वल भविष्य के ज्योति- कण- 4/- उज्जवल भविष्य के सम्बन्ध में वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य के प्रेरक कथन।
22. वृक्षारोपण एक परम पुनीत कार्य- 3/- इस युग की भयंकर विभीषिका पर्यावरण प्रदूषण, वृक्षारोपण का अक्षयपुण्य। क्या करें, कैसे करें?
23. गहना कर्मणोगति- 4/- चित्रगुप्त का परिचय। कर्मों की श्रेणियाँ। किन कर्मों के फल को किस प्रकार भुगतना पड़ता है? तीन दु:ख एवं उनके कारण।
24. हम भाग्वादी नहीं, कर्मवादी बनें- 4/- भाग्यवाद पर सटीक विश्लेषण। भाग्यवाद की हानियाँ।
25. हारिये न हिम्मत- 2/- छोटे- छोटे सूत्र। कहीं से भी पढऩे पर समस्या का समाधान।
26. मन:स्थिति बदले, तो परिस्थिति बदले- 3/- जैसी दृष्टि वेसी सृष्टि। गरीबों में अमीरी का आडम्बर। परिस्थिति मन:स्थिति से किस प्रकार बदलती है। कई दृष्टत..........
27. संकल्प शक्ति की प्रचण्ड प्रतिक्रिया- 4/- संकल्प शक्ति की कई असाधारण घटनाओं का वर्णन।
28. अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा- 4/- आत्मनिर्माण .............हम सुधरें तो युग सुधरे।
29. श्रम है सुख का सेतु- 4/- श्रमनिष्ठ के प्रति प्रेरक प्रसंग
30. गन्दगी की घृणित असभ्यता- 3/- गन्दगी पर कटाक्ष एवं इसे हटाने के संकल्प प्रयास
31. सदाचरण मर्यादा पालन- 4/- सभी प्रकार की मर्यादा एवं सदाचरणों का विश्लेषण एवं इनके लाभ।
33. सफलता सात सूत्र- 5/- सात सूत्र क्याा हैं?
34. सफलता के तीन साधन- 5/ छोट- छोटे व्यावहारिक नुस्खे, जिससे बुद्धि बढ़े।
36. व्यवस्था बुद्धि की गरिमा- 5/ व्यवस्था बुद्धि से कोई भी कार्य असम्भव नहीं। व्यवस्था बुद्धि कैसे प्राप्त हो?
37. गुरुसत्ता की अमृतवाणी- 2/- पं.श्रीराम शर्मा आचार्य तथा अन्य महापुरुषों के प्रेरणा भरे वाक्य।
38. मातृ शक्ति की अमृतवाणी- 2/- माता भगवती देवी शर्मा के प्रेरणाप्रद वाक्य।
39. प्रेरणास्पद कथा गाथाएँ- 16/- अनेक प्रकार की प्रेरणास्पद घटनाओं का वाक्य।
40. युग यज्ञ पद्धति- 3/- दीप यज्ञ की सरल विधि, प्रार्थना, यज्ञ दर्शन।
41. युग संस्कार पद्धति- 3/- संस्कारों की सूत्रात्मक पद्धति।
42. बोलती दीवारें- 3/- सैकड़ों आदर्श वाक्य- दोहा वाक्य।
43. गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों पर 25 पुस्तकें, प्रति पुस्तक- 2/ एवं सुरक्षा, इंद्रिय संयम, समय का सदुपयोग, स्वाध्याय एवं सत्संग, सहयोग और सहिष्णुता, ईश्वरीय न्याय, आत्म कल्याण का मार्ग, गृह लक्ष्मी की पतिष्ठ, विवेक की कसौटी, शक्ति का सदुपयोग, सन्तान के प्रति कर्तव्य, पवित्र जीवन, नारी की महानता, ईश्वर का विराट रूप, आत्मज्ञान एवं आत्मकल्याण, जीवन और मृत्यु, शिष्टचार एवं सहयोग। इसी प्रकार के विभिन्न शीर्षकों की पुस्तकें।
नोट :- इनके अतिरिक्त विद्यार्थी सम्बन्धी साहित्य विद्यालय लाइब्रेरी या अन्य स्रोतों से भी प्राप्त किया जा सकता है।

परिशिष्ट
मानव मूल्य (विकास क्रिया)
1. स्वास्थ्य (क) शारीरिक
आहार- बिहार के नियमों की सूची बनाना। संतुलित आहार का चार्ट बनाना।
योग व्यायाम- प्रज्ञायोग का चार्ट दिखाना, तीन प्रायायाम -- (अनुलोम विलोम, नाड़ीशोधन- प्राणाकर्षण) संयम- संयम से सम्बन्धित चुने हुए वाक्यों की सूची बनाना, समझना और संयमी जीवन के लिए संकल्पित होना।
शाकाहार- अंकुरित अन्न के लाभों की सूची बनाना।
नशा और दुव्र्यसनों से मुक्ति- * नशा विरोधी नारे एवं नशा उन्मूलन के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी कराना।
* नशा विरोधी रैली निकालना, पोस्टर चिपकाना।
* तम्बाकू एवं गुटखा सेवन के घातक परिणामों के चित्र चिपकाना
* तम्बाकू के भयंकर दुष्परिणामों से छात्रों का अवगत कराना और यह संकल्प कराना कि वे गुटखा आदि का सेवन नहीं करेंगे।
(ख) मानसिक
मनोविकारों का उन्मूलन- * मनोंविकारों से हानियों की सूची- ईष्र्या, द्वेष, अश्लील- चिंतन एवं व्यवहार आदि मनोविकारों के दुष्परिणामों की सूची बनाना। मन को गन्दे विचारों से बचाना।
सद्विचारों एवं उनका क्रियान्वयन- * सत्साहित्य का अध्ययन एवं पठित विषय पर परिचर्चा व प्ररेणा।
* किन्हीं विषय परिस्थितियों में विवेकपूर्ण निर्णय लेने का अभ्यास कराना, उत्तरदायित्व पूर्ण कार्य सौंपना, कैम्प फायर, शैक्षिक भ्रमण, स्काउटिंग एवं गाइड संचालन आदि ऐसी स्थितियाँ निॢमत करना जिनमें ईमानदारी को परखा जा सके।
2. शालीनता
अनुशासन- जिम्मेदारी के कार्य सौंपकर शालीन व्यवहारों का अभ्यास। परस्पर अभिवादन एवं सम्मान पूर्वक संबोधन, सबसे आप कहकर बोलना। बैठना, चलना, फिरना, बात करना, सभी में शालीनता का विशेष ध्यान रखना। कोई ऐसी बात कभी न कहना, जिससे किसी के हृदय का चोट लगती हो।
शालीनता ही क्यों?- परिचर्चा, निबंध- भाषाण प्रतियोगिता।
सभ्यता- शालीनता के प्रेरक प्रसंगों का संकलन।
सभ्यता- सभ्यता पूर्ण व्यवहारों की चर्चा।
सज्जनता- विद्यालय में छात्र- छात्राओं का जन्मदिवस मनाते समय सदुगुणों को अपनाने का संक ल्प।
सहनशीलता- सहनशीलता के उदाहरण, उन पर परिचर्चा व प्रेरणा।
3. स्वावलम्बन
आत्म निर्भरता- कुटीर उद्योगों का कार्यानुभव के रूप में प्रयोग एवं श्रम के प्रति सम्मान। आत्मनिर्भरता के गुणों की सूची, उन पर पचिर्चा।
आत्म विश्वास- सफालता में आत्म- विश्वास के उदाहरण।
श्रमशीलता एवं स्वच्छता- श्रमशील एवं स्वावलम्बी छोत्रों का चयन और सम्मान, श्रमदान, विद्यालयीन स्वच्छता।
* सहकारी भावना सहपाठियों में दृढ़ करना।
* सहकारिता पर निबंा प्रतियोगिता।
* शरीर, वस्त्र, वस्तु एवं स्थान आदि की स्वच्छता पर ध्यान देना, अपनी कक्षा की सफाई, पुताई, सजावट आदि मिलकर स्वयं करना, शाला प्रांगण को स्वच्छ रखना, स्वच्छता के लिए साप्ताहिक श्रमदान करना, गंदी वस्तियों में भी स्वच्छता अभियान चलाना, नालियों में डी.डी.टी. का छिडक़ाव करनार।
4. सेवा भावना
लोक कल्याण, सेवा और सहयोग-
* निर्धन छात्रों के लिए पुरानी पुस्तकों से बैंक की व्यवस्था करना।
* अपना जेब खर्च बचाकर जरूरतमंद छात्रों की सहायता करना।
* जरूरतमंद लोगों को पुराने एवं उपयोगी वस्त्र उपलब्ध कराना।
* दैवी आपदाओं में सहायता हेतु सामूहिक रूप से राशि एकत्र करना तथा उसका हिसाब रखना।
पर्यावरण जागरूकता --
* वृक्षारोपण करना और वृक्षों का संरक्षण।
* तुलसी पौधों का वितरण करना।
* क्षेत्रीय आवश्कता के अनुसार अन्य कार्य।
5. शैक्षिक
स्मृति का विकास :-
* मन लगाकर पढऩा (विषय वस्तु में से)।
* सारगर्भित शब्दों और वाक्यों का चयन करना, विषयवस्तु का संक्षेपण।
* प्रत्येक पैराग्राफ से एक अथवा दो वाक्यों का चयन करना, विषयवस्तु का संक्षेपण।
* प्रत्येक पैराग्राफ से एक अथवा दो वाक्यों का चयन करना, उनमें से कोई प्रतिनिधि शब्द चुनना। इन शब्दों को किसी क्रम में व्यवस्थित करना। इस क्रम के सहारे विषय वस्तु को याद रखना और पुन: स्मृति के आधार पर प्रस्तुत करना सरल होगा। शब्दों का प्रथम वर्ण भी याद रखने से भी स्मृति का विकास होगा।
अभिव्यक्ति :-
* निबंध प्रतियोगिता, भाषाण प्रतियोगिता, काव्य पाठ, कहानी कथन, लघु नाटिकायें, शब्दों के सटीक प्रयोग, व्याख्यानमाला, विचार मंच, चित्रकथा, पद क्रम का सही प्रयोग।
सृजनात्मकता :-
* मौलिक चिन्तन, मौलिक लेखन, किसी एक विधा को दूसरी विधा में बदल कर लिखना- जैसे कहानी को नाटक में, को कहानी में, समस्या पूर्ति आदि।
* तुकबन्दियों के साथ छोटी- छोटी कविताएँ, गीत आदि लिखना।
* खिलौना, मॉडल, चित्र आदि बनाना।
विषय विस्तार --
* एक वाक्य में दी गई संक्षिप् विषय वस्तु पर पैराग्राफ लिखना, सूत्रों की विस्तार सहित व्याख्या करना। निष्कर्ष निकालना।
समझ-
* तथ्यों की व्याख्या विवेचना।
चयन, तर्क, तुलना, समीक्षा, संश्लेषण, विश्लेषण, विस्तार-
* निन्नलिखित स्थितियाँ उत्पन्न करना- यदि ऐसा होता हो.............। क्यों................? कैसे..............? क्या संभावनाँ हो सकती हैं? प्रस्तुत विषय वस्तुक उपरोक्त आधारों पर समझना और प्रस्तुत करना।
6. आध्यात्मिक
आत्मबोध (अपनपा स्वरूप पहचानना)
* आत्मस्वरूप पर उद्बोधन- शरीर से अधिक आत्मा का महत्व हे। आत्मा और शरीर अलग- अलग हैं। आत्मा के निकल जाने पर शरीर शव के रूप में पड़ा रहा जाता है।
* आध्यात्मिक मूल्यों पर भाषण एवं निबंध प्रतियोगिता।
* ऐसी कहानियों का संकलन, जिनमें आध्यात्मिक मूल्य हों।
संकल्प शक्ति- संकल्पवान, व्यक्तियों के संस्मरण एक त्र करना।
आत्मानुशासन- स्वप्रेरणा से अनुशासित रहना।
निर्वैरता- किसी से वैर- विरोध और ईष्र्या- द्वेष न करना।
सत्य- * सदैव हर स्थिति में सत्य बोलना।
ईमानदारी- * ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, साहस आदि गुणों से सम्पन्न छात्रों का सम्मान।
कर्तव्य बोध- * जीवन के उद्देश्य को समझते हुए अपने कर्तव्यों का ठी- ठीक निर्वाह बरना।
संवेदनशील- दूसरों के दुख में दुखी और सुख में सुखी होना। भूकम्प, बाढ़, अकाल, महामारी जैसी आपदाओं में छात्रों को सहयोग के लिए उत्प्रेरित करना।
उपासना-
* उपासना का दश्रन और व्यवहार समझना।
* गायत्री मंत्र जप/ सर्वधर्म प्रार्थना करना।
* उपासना में प्रतीकों की विवेचना करना।
मानव मूल्यों का विकास-
* मानव मूल्यों पर हस्तलिखित पत्रिका तैयार करना।
* दीवार, मेगजीन पर मूल्यपरक वाक्यों का लेखन, मानव मूल्यों के विकास के लिए विविध क्रिया- कलाप और उनका अभ्यास।

प्रार्थना
वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जावें
पर सेवा पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जावें॥

हम दीन दुखी निबलों विकलों, के सेवक बन संताप हरें।
जो हों भूले भटके, बिछुड़े, उनको तारें खुद तर जावें॥
वह शक्ति हमें दो दयानिधे................................।
छल, द्वेष दम्भ, पाखण्ड, झूठ, अन्यास से निशदिन दूर रहें।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम सुधा रस बरसावें॥
वह शक्ति हमें दो दयानिधे,.......................।

निज आन- मान मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे, अभिमान रहे।
जिस देश जाति में जन्म लिया, बलिदान दसी पर हो जावें॥
वह शक्ति हमें दो दयानिधे........................।

प्रार्थना
हे प्रभो अपनी कृपा की छाँह में ले लीजिये।
कर दूर खोटी बुद्घि सबको नेक नियति दीजिये।।
हे प्रभो! अपनी -- ।

हम आप के होकर रहे, शुभ प्रेरणा ले आपसे।
करते रहें नित पुण्य हम, बचते रहें हर पाप से।।
हे प्रभो! अपनी -- ।

सुख बांट कर, दु:ख लें बँटा, प्रभु भाव यह दे दीजिये।
उजला चरित्र बना हमें, उज्ज्वल भविष्यत् दीजिये॥
हे प्रभो! अपनी -- ।

ध्यान क्यों और कैसे
यदि मनुष्य को अपनी महानता कायम रखनी है और उसे विकसित करना है, तो उसे अपने सृजेजा के साथ गहरा संबंध बनाए रखना आवश्यक है। इस संबंध के अभ्यास का नाम है- ध्यान। विश्व में जितने आध्यात्मिक महापुरुष हुए हैं, उन सबमें स्रष्ट के साथ संबंध बनाए रखने की यह विशेषता अवश्य रही है। जो लोग यह चाहते हैं कि जीवन की विभिन्न शक्तियाँ बिखर न जाएँ, सन्मार्गगामी ही रहें, उन्हें अन्त:चेतना को परमात्मा चेतना से जोड़े रखने के लिए ध्यान का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।
ध्यान का क्रम :-
योग व्यायाम के बाद शांत- स्वस्थ चित्त बैठें। मन में सत्संकल्प जाग्रत् करने के लिए प्रार्थना का सामूहिक पाठ करें।
जैसे सूर्योदय के साथ सभी दिशाओं में प्रकाश भर जाता है, उसी प्रकार भावना करें कि हमारे भाव भरे आह्वान में हमारे इष्ट परमात्मा का प्रकाश हमारे चारों तरफ भर गया है। हम जल से मछली अथवा वायु में पक्षी की तरह उसी स्थिति में हैं। इसके साथ गायत्री मंत्र अथवा अपने इष्ट मंत्र का जप प्रारंभ करें। भावना करें कि हमारे मंत्र जप और ध्यान के माध्यम से इष्ट का प्रकाश हमारे शरीर, मन और अंत:करण के हर भाग में गहराई तक पहुँच रहा है, स्थापित हो रहा है। लगभग पाँच- सात मिनट ध्यान की स्थिति में रहें।
अन्त में शांति पाठ के साथ समाप्त करें

ज्ञानयोगी की तरह सोचें, कर्मयोगी की तरह पुरुषार्थ करें
और भक्तियोगी की तरह सहृदयता उभारें।
-- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

यहाँ वर्णित 18 संकल्प इक्सीसवीं सदी के उज्जवल भविष्य की सर्वोपयोगी आचार संहता है। जीवन में इन सूत्रों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति उन्नति के शिखर पर पहुँच सकता है। इसका प्रत्येक सूत्र व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र में आमूलचूल परिवर्तन की आधार शिला है।
व्यक्ति निर्माण और राष्ट्ररोत्थान के बीच इन्हीं सूों में विद्यमान हैं। हमारे प्रयासों का एक सुनिश्चित घोषण पत्र है। इसे ठीक प्रकार से समझें। इस पर मनन- चिंतन करें और यह संकल्प करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है।
नित्य पाठ करें, धीरे- धीरे पढ़ें। समझकर पढ़ें, श्रद्धापूर्वक पढ़ें।
हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।
शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्म- संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।
मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।
अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।
मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।
समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।
चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।
मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी, उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।
दूसरों के साथ वह व्यवहार नहीं करेंगे, जो हमें अपने लिए पसन्द नहीं।
नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।
संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।
परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे।
सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नव सृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।
राष्टरीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि के कारण
परस्पर कोई भेद- भाव न बरतेंगे।
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट
बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो युग अवश्य बदलेगा।
हम बदलेंगे- युग बदलेगा, हम सुधरेंगे- युग सुधरेगा। इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।

विद्याथी्र जीवन के महात्त्वपूर्ण सूत्र

प्रगतिशील जीवन के चार चरण --
1. समझदारी
2. ईमानदारी
3. जिम्मेदारी
4. बहादुरी
आत्मिक प्रगति के चार सोपान --

1. आत्म समीक्षा 2. आत्म सुधार
3. आत्म निर्माण
4. आत्म विकास
जीवन निर्माण के चार सूत्र --

1. साधना 2. संयम
3. स्वाध्याय 4. सेवा

समर्थ जीवन के चार स्तंभ --

1. इंद्रिय संयम 2. समय सेवा
3. अर्थ संयम 4. विचार संयम
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के शिक्षा समबन्धी विचार
अध्यापक को यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रत्येक बालक में एक विशेष प्रकार की कुशलता एवं प्रतिभा जन्म से ही विद्यमान होती है। अत: उसकी कुशलता के अनुकूल ही शिक्षा का स्तर रखना चाहिए ताकि उस प्रतिभा का समुचित उपयोग हो सके।
प्रत्येक छात्र तथा अभिभावक को यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि ऊँचे वेतन वाली नौकारी प्राप्त करना ही पढ़ाई का एक मात्र लक्ष्य नहीं है। आजीविका उपार्जन के लिये अपनी परिस्थितियों के अनुरूप कोई भी व्यवसाय करते हुए एक योग्य नागरिक बनाने की बात सोचना चाहिये क्योंकि हर शिक्षित को नौकरी देना सरकार के लिये संभव नहीं है।
शिक्षा न तो विलास है न श्रृंगार। वह तो जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसके बिना आंतरिक गुणों का विकास संभव नहीं हो सकता। मानवीय मूल्यों की स्थापना तथा चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता लाना ही तो शिक्षा का उद्देश्य है।
व्यक्ति के अंदर अगणित शक्तियाँ और संभावनाएँ छिपी पड़ी है, यदि उन्हें समुचित रीति से विकसित एवं परीपुष्ट होने का अवसर मिल जाय तो सामान्य परिस्थितियों में पैदा हुआ व्यक्ति भी महामानव स्तर का बना सकता है। महामानव बनाने की कला हर शिक्षक में होनी चाहिए।
प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति का स्वरूप यह था कि पुस्तकीय पाठ्यक्रम उतना ही होता था, जितने से जीवन यापन तथा संसार का ज्ञान मिल सके, शेष भाग में जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण होता था जिसे विद्या कहा जाता है। इस प्रकार शिक्षा व विद्या का समन्वय करते हुए समग्र पाठ्यक्रम होता था।


फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती
पर सदगुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है।
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य






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